कुमाऊं में होली शुरू होने से पहले चीर बंधन की कहानी…

आज हम आपको कुमाऊंनी चीर बंधन होली का महत्व बताने जा रहे हैं। कुमाऊंनी होली में चीर या निशान बंधन का विशेष महत्व माना जाता है। होलिकाष्टमी के दिन मंदिरों में सार्वजनिक स्थानों पर एकादशी को मुहूर्त देखकर चीर बंधन किया जाता है। चीर बांधने के साथ ही होल्यारों द्वारा ने घर-घर जाकर खड़ी होली गायन होना शुरू हो गया तथा होली के गीतों और रंगों ने वातावरण होलीमय बन जाता है।

कुमाऊं में चीर व निशान बंधन की भी अलग विशिष्ट परंपरायें हैं। इनका कुमाउनीं होली में विशेश महत्व माना जाता है। होलिकाष्टमी के दिन ही कुमाऊं में कहीं कहीं मन्दिरों में ‘चीर बंधन’ का प्रचलन है पर अधिकांशतया गांवों, शहरों में सार्वजनिक स्थानों में एकादशी को मुहूर्त देखकर चीर बंधन किया जाता है। इसके लिए गांव के प्रत्येक घर से नऐ कपड़े के रंग बिरंगे टुकड़े ‘चीर’ के रूप में लंबे लटठे पर बांधे जाते हैं। इस अवसर पर ‘कैलै बांधी चीर हो रघुनन्दन राजा’, ’सिद्धि को दाता गणपति बांधी चीर हो’ जैसी होलियां गाई जाती हैं। इस होली में गणपति के साथ सभी देवताओं के नाम लिऐ जाते हैं। कुमाऊं में ‘चीर हरण’ का भी प्रचलन है।

गांव में चीर को दूसरे गांव वालों की पहुंच से बचाने के लिए दिन-रात पहरा दिया जाता है। चीर चोरी चले जाने पर अगली होली से गांव की चीर बांधने की परंपरा समाप्त हो जाती है। कुछ गांवों में चीर की जगह लाल रंग के झण्डे ‘निशान’ का भी प्रचलन है, जो यहां की शादियों में प्रयोग होने वाले लाल सफेद ‘निशानों’ की तरह कुमाऊं में प्राचीन समय में रही राजशाही की निशानी माना जाता है। बताते हैं कि कुछ गांवों को तत्कालीन राजाओं से यह ‘निशान’ मिले हैं, वह ही परंपरागत रूप से होलियों में ‘निशान’ का प्रयोग करते हैं। सभी घरों में होली गायन के पश्चात घर के सबसे सयाने सदस्य से शुरू कर सबसे छोटे पुरुष सदस्य का नाम लेकर ‘घर के मालिक जीवें लाख सौ बरीस…हो हो होलक रे’ कह आशीष देने की भी यहां अनूठी परंपरा है।
कुंमाऊ में होली प्रारंभ करने से पहले प्रत्येक घर से एक-एक नए कपड़े के रंग बिरंगे टुकड़े चीर के रूप में लंबे लट्ठे पर बांधे जाते हैं। उसके बाद राम, कृष्ण, शिव-पार्वती, देशी फुहारों, वेदांत, रसिक, झोड़-झुमटा, सिद्धि को दाता, रघुनंदन राजा, कैलै बांधी चीर, गणपति बांधी चीर होली गाकर होली का शुभांरभ किया जाता है।
क्या होता है चीर और क्यों बांधते हैं
मंदिरों में होली से पूर्व एकादशी पर खड़ी होली के पहने दिन चीर बांधने का अपना ही महत्व है। इस दिन लोग बांस के लंबे डंडे में नए कपड़ों की कतरन को बांधकर मंदिर में स्थापित करते हैं। फिर चीर के चारों ओर लोग खड़ी होली गायन करते हैं और घर-घर जाकर खड़ी होली गाते हैं। होलिका दहन के दिन इस चीर को होलिका दहन वाले स्थान पर लाते हैं और बांस में बंधे कपड़ों के कतरन को प्रसाद के रूप में बांटते हैं। जिसे लोग अपने घरों के मुख्य द्वार पर बांधते हैं। ऐसी मान्यता है कि इससे घर में बुरी शक्तियों का प्रवेश नहीं होता और घर में सुख-शांति बनी रहती है।





