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हल्द्वानी में इस जगह है साईं बाबा का इकलौता मंदिर, अपने चमत्कारों से प्रसिद्ध हैं शिरडी के सांई बाबा

शिरडी के सांई बाबा का नाम किसने नहीं सुना, प्राचीन समय से लेकर आज तक समाज में इनके चमत्कार प्रसिद्ध है। बता दें जिस तरह हिंदू धर्म के अन्य देवी-देवताओं के लाखों की तादाद में भक्त दुनिया में है। ठीक उसी तरह साईं बाबा के देश-विदेश में असीम भक्त पाए जाते हैं। आज हम आपको साईं बाबा के सबसे प्रसिद्ध धार्मिक स्थल के बारे में बताने जा रहे हैं।

साईं बाबा ने अपना पूरा जीवन फकीरों की तरह जनकल्याण का काम करते हुए व्यतीत कर दिया। आज भी साईं भक्त अपनी हर समस्याओं के समाधान के लिए साईं दरबार पहुंच जाते हैं। साईं बाबा की पूजा के लिए गुरुवार का दिन सबसे खास बताया गया है। इस दिन साईं भक्त भजन, कीर्तन के साथ-साथ व्रत भी करते हैं।

साईं बाबा के भक्त बाबा पर अटूट विश्वास करते हैं और बाबा अपने भक्तों की हर मुराद पूरी करते है। आपको बता दें कि साईंबाबा एक संत थे, जिन्होंने जीवनभर जरूरतमंदों की सेवा की। क्या आपको पता है कि हल्द्वानी के कठघरिया में भी साईं बाबा का एक विशाल मंदिर स्थित है। जहां हर गुरुवार को बाबा के मंदिरों में भक्तों की भीड़ लगी रहती है। साईं मंदिर में गुरुवार को सैकड़ों लोग बाबा के दर पर मन्नत लेकर पहुंचते है। भक्तों का कहना है कि सच्चे मन से मांगी गई हर मुराद साईं बाबा पूरी करते हैं। हल्द्वानी स्थित साईं बाबा के इस मंदिर के द्वार हर रोज सुबह 5 बजे भक्तों के लिए खुल जाते हैं। शाम 7 बजे संध्या आरती के बाद मंदिर बंद हो जाता है।

साईं बाबा का जन्म कहां हुआ

साईं बाबा का जन्म कब और कहां हुआ था एवं उनके माता-पिता कौन थे, इस बारे में कोई ऐतिहासिक प्रमाण मिलना कठिन है। उनके जन्मस्थान एवं तिथि की बात वास्तव में उनके अनुयायियों के विश्वास एवं श्रद्धा पर आधारित हैं। शिरडी साईं बाबा के अवतार माने जाने वाले श्री सत्य साईं बाबा ने अपने पूर्व रूप का परिचय देते हुए शिरडी साईं बाबा के प्रारंभिक जीवन संबंधी घटनाओं पर प्रकाश डाला है, जिससे ज्ञात होता है कि उनका जन्म 28 सितंबर 1835 में तत्कालीन हैदराबाद राज्य के पाथरी नामक गांव में एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। किसी दस्तावेज से इसका प्रामाणिक पता नहीं चलता है। स्वयं शिरडी साईं ने इसके बारे में कुछ नहीं बताया।

जब साईं बाबा आए शिर्डी

जब साईं बाबा शिरडी आते थे, तो वह अपना ज्यादातर समय एक नीम के पेड़ के नीचे बिताते थे. जिसे अब गुरूस्थान के नाम से जाना जाता है। एक किवदंती के अनुसार, जब कुछ ग्रामीणों ने पेड़ के पास की जमीन खोदना शुरू की , तो साईं बाबा ने उन्हें रूकने के लिए कहा। उन्होंने कहा कि यह पूर्वजों का विश्राम स्थल है। अगर आप कभी शिरडी की यात्रा करते हैं और आपको पेड़ से गिरे नीम के पत्ते चखने का मौका मिले, तो आप इसका स्वाद चखकर हैरान रह जाएंगे। दिलचस्प बात यह है कि यहां नीम की पत्तियों का स्वाद कड़वा नहीं बल्कि मीठा होता है। ऐसा माना जाता है कि जिन लोगों को नीम की पत्ती चखने का मौका मिलता है, वे स्वस्थ रहते हैं और उन्हें कोई बीमारी नहीं होती।

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